धर्म का मर्म जाना नहीं।
तो कहीं भी ठिकाना नहीं।।
मंदिरों और मठों में सुनो,
जाने का अब जमाना नहीं।।
मंथरा लाख कोशिश करे,
राम को वन भिजाना नहीं।
तुमको जन्मा था जिनने कभी,
उनके दिल को दुखाना नहीं।।
वो तुम्हें छोड़कर जायेगा,
साथ तुम भी निभाना नहीं।।
पी रहे हैं बीयर छानकर,
जिनने पानी को छाना नहीं।।
दोस्तों से गिला है उन्हें,
दुश्मनों पर निशाना नहीं।।
ये सिसासत के रंग हैं “लता”,
अम्न बस्ती में लाना नहीं।।
तो कहीं भी ठिकाना नहीं।।
मंदिरों और मठों में सुनो,
जाने का अब जमाना नहीं।।
मंथरा लाख कोशिश करे,
राम को वन भिजाना नहीं।
तुमको जन्मा था जिनने कभी,
उनके दिल को दुखाना नहीं।।
वो तुम्हें छोड़कर जायेगा,
साथ तुम भी निभाना नहीं।।
पी रहे हैं बीयर छानकर,
जिनने पानी को छाना नहीं।।
दोस्तों से गिला है उन्हें,
दुश्मनों पर निशाना नहीं।।
ये सिसासत के रंग हैं “लता”,
अम्न बस्ती में लाना नहीं।।

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