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एक औरत का जिस्म - पाब्लो नेरूदा की सुप्रसिद्ध कविता -

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता

अधखुली कँचुकी उरोज अध आधे खुले - पद्माकर

यह तुम्हारे विशाल उरोज - दयानन्द पाण्डेय

कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की - Akbar Illahabadi

इक उभरता है यहाँ एक के मिट जाने से - Akbar Illahabadi

धर्म का मर्म जाना नहीं - कवियत्री – लता शबनम